सामाजिक संवेदना के अच्छे समझदार और ढोंग, पाखंडवाद, अंधविश्वास के घोर विरोधी थे संत कबीर: ईं निराला

डेस्क

सामाजिक संवेदना के अच्छे समझदार और ढोंग, पाखंडवाद, अंधविश्वास के घोर विरोधी थे संत कबीर-ईं निराला

बिहार/सुपौल: आज संत सम्राट बहुजन मुक्ति आंदोलन के अग्रदूत भक्ति रस के कवि कबीर साहब की जयंती समारोह सादगी पूर्ण तरीके से छातापुर प्रखंड के राजेश्वरी पश्चिमी पंचायत में रामचंद्र राम के निज निवास पर राष्ट्रीय युवा महासंघ के बैनर तले मनाया गया।

कबीर जयंती कार्यक्रम की शुरुआत कबीर साहब के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनके अनुयायियों ने किया। तत्पश्चात कबीर के मुख्य ग्रंथ बीजक से विभिन्न विषयों पर प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में राष्ट्रीय युवा महासंघ के अध्यक्ष इंजीनियर एलके निराला उपस्थित हुए। कार्यक्रम का उद्घोष महंत अयोध्या दास ने किया। जयंती समारोह को महासंघ अध्यक्ष इंजीनियर एल के निराला ने संबोधित करते हुए कहा”संत सम्राट कबीर ने धर्म और ईश्वर दोनों के पक्ष- विपक्ष में लिखा है। ऐसा हिम्मत कोई विरला ही कर सकता है। कबीर राम नाम जपने को भी कहते थे तो कभी वह ग्रंथों के ज्ञान पर भी गहरा प्रश्न खड़ा करते थे। यह बात उनके पंक्ति से समझ सकते हैं-“पौथी पढ़ी- पढ़ी जग मुआ पंडित भया न कोई।
ढाई आखर प्रेम का जो पड़े वह पंडित होय।

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कबीर साहब ने उस जमाने में प्रचलित ईश्वरीय नामों के पक्ष में कुछ साहित्य रचा था पर लगता है। वह साहित्य उनके शुरुआती दिनों का होगा कोई भी विचारक जब अध्यात्म की खोज शुरू करता है तब वह उस समय की प्रचलित भक्ति में शांति खोजने लगता है। शुरुआत यहीं से होती है पर कहीं भी शांति नहीं मिलती तब अंततः वह सत्य को ही पा लेता है, इसलिए बाद में जब वह जागे होंगे तब उन्होंने जो साहित्य रचा उसे पढ़ने पर हम जान सकते हैं कि वह धर्म और ईश्वरबाद के विरोध में और मानवतावाद के पक्ष में थे ।यही कारण हो सकता है कि कबीर के साहित्य में धर्म के पक्ष और विपक्ष दोनों के स्वर मिलते हैं।

उन्होंने कबीर के बारे में गंभीरता से बताते हुए कहा कि उनकी विचारधारा बौद्धिक विचार धारा से मिलती थी पर वह बौद्ध थे ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि जब रविदास, कबीर दास जैसे संत मौजूद थे उन सदियों में भारत से बौद्ध विचारधारा और बौद्ध संस्कृति का दमन पूर्ण रूप विदेशियों द्वारा किया जा चुका था । तो ऐसे विपरीत परिस्थिति में बोद्ध विचारधारा इन तक कैसे पहुंचती, पर यह निश्चित है कि अगर बौद्ध विचारधारा उपलब्ध होती तो संत कबीर बोध ही कहलाए होते।

भक्ति काल से लेकर जब अंग्रेजों के समय भारत में खुदाई कर बौद्ध अवशेषों को निकाला गया, पचरंगी झंडा बनाया तब तक 700 साल भारत में बौद्ध धर्म सोया रहा। इस कारण संत रविदास, संत कबीर दास जैसे अनेक ज्ञानी संतो के पास बुध का संदेश नहीं पहुंच पाया, पर यह भी सच है कि असल बौद्ध विचारधारा और बहुजन संतों की विचारधारा एक ही दिशा में मानवतावाद के पक्ष में है और कर्मकांड, पाखंड, अंधविश्वास के विरोध में है ।

20वीं सदी के महान संत सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज ने भी अपने स्तुति में सदगुरु कबीर रविदास ….को अपना स्थान दिया और उन्होंने कहा धन, ऋषि, संतन, धन्य बुद्ध जी धन्य है साहब संत कबीर जी…..।

इंजीनियर निराला ने कहा बहुजन विचारधारा और संत कबीर को अगर एक वाक्य में कहे तो इसका मतलब है -“जियो और जीने दो ”
कबीर ना हिंदू थे ना मुसलमान, वह मानवतावादी थे अभी अंधविश्वास, पाखंडवाद, भेदभाव, जाति प्रथा पर करारी चोट की थी उन्होंने कहा था -“जो तू ब्राह्मणी का जाया आन बाट काहे नहीं आया”
वे समता समानता में विश्वास करते थे ऊंच-नीच छुआछूत जैसे सामाजिक बुराई को अपने घर एवं पद के माध्यम से हमेशा खंडन करते रहे। कबीर आज के समाज के लिए भी उतना ही प्रसांगिक है जितना उस समय के लिए थे।

सभा को संबोधित करते हुए महासंघ के मार्गदर्शक दिलीप यादव ने कहा वर्तमान समय में भारत के मूल निवासियों को कबीर, नानक, बुद्ध, रविदास के बताए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है। क्योंकि संतों का मार्ग सरल है और शुगम भी है और सबके लिए सुलभ है। लेकिन अंधविश्वास एवं आडंबर से बचने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा” मसी कागज छुयो नहीं कलम लियोना हाथ” अर्थात कबीर न किसी स्कूल कॉलेज गए लेकिन उनके पास आत्म ज्ञान और अनुभव ज्ञान था। जिसके बल पर बड़े-बड़े धर्म धुरंधर को पंडित को उन्होंने शास्त्रार्थ के द्वारा खंडन किया। उनका जवाब तर्क भरा और तर्कशील था वसंत के साथ-साथ बड़े दूर द्रष्टा दार्शनिक भी थे।

आज के शिक्षित कहे जाने वाले एवं बड़ी-बड़ी डिग्रियों के मालिकों के पास क्या वह ज्ञान है जो कबीर के पास था, बड़े- बड़े अधिकारी, राजनेता भी बाह्य आडंबर अंधविश्वास के तले दबा हुआ है।

कार्यक्रम का मुख्य रूप से सरवन कुमार यादव, ओम प्रकाश, जिला अध्यक्ष उमाशंकर कुमार राम, नीतीश कुमार, मनीष कुमार, गुनदेव दास ,महेंद्र दास आदि ने संबोधित किया। मौके पर मयंक राम, सिंटू कुमार मेहता, बिंदेश्वरी मंडल, जवाहर दास, विद्यानंद राम, बुद्धू राम ,पप्पू चौधरी, योगानंद यादव, पंकज ऋषिदेव, सदानंद सादा, महेन्द्र दास, महेश्वरी शर्मा, रुक्मिणी देवी, रजिया देवी, यशोदा आदि उपस्थित रहे।

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